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चिराग की चिंता और पारस का पैंतरा

Bihar

चिराग की चिंता और पारस का पैंतरा

संध्या तिवारी। पासवान परिवार और लोक जन शक्ति पार्टी के अंदुरुनी हाई वोल्टेज ड्रामा थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसमें गर्माहट इतनी दिख रही कि इंद्रदेव को लगातार बारिश करानी पड़ रही है। बहरहाल, चाचा पारस और भतीजा चिराग के बीच की राजनीतिक और पारिवारिक तल्खी कम होने की बजाए बढ़ ही रही है। मौजूदा हालात में तालमेल की संभावना दूर की कौड़ी समान दिख रही है। कैसे चुपचाप चाचा पारस ने पार्टी के सभी सांसदों को भरोसे में लेकर रातो-रात चिराग तले अंधेरा कर दिया, सब जानते हैं। लोजपा के सभी 5 सांसद अब पारस गुट के सिपाही बन चुके हैं। चिराग गुट में सांसद सिर्फ चिराग ही बचे हैं। लोकसभा में संसदीय दल के नेता भी पारस बन गए, चिराग को हटाकर। पटना में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी सम्पन्न करवा ली गयी। अब चिराग भी रविवार (20 जून) को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुला रहे हैं। चिराग पासवान द्वारा पारस गुट के नेताओं पर लोजपा के चुनाव चिन्ह का दुरुपयोग करने संबंधी शिकायत भी दर्ज कराई गई है।

कुलमिलाकर देखा जाए तो पासवान और लोजपा परिवार का यह झगड़ा चमुहाने पर खड़ा हो गया है, जहाँ से कोई दिशा नही समझ आ रही। अब चाचा पारस का पैंतरा यह कि भतीजा तानाशाह हो गया था इसलिए ऐसा हुआ, पार्टी को स्वर्गीय रामविलास पासवान के पदचिन्हों पर आगे बढ़ाएंगे, दलितों का उत्थान करेंगे आदि बिहार से दिल्ली तक की मीडिया को गर्म मशाला दे रहा है, तो वहीं चिराग पासवान की चिंता यह कि क्या वह अपने पिताजी द्वारा सींची गयी पार्टी का उत्तराधिकारी बने रह पाएंगे या प्रकाश झा की फ़िल्म राजनीति की ‘फॉल इन लाइन’ वाला हाल हो जाएगा? इस तरह के कशमकश में खासकर बिहार की मीडिया को बरसात में बिना बाहर निकले ही खबर मिल रही है। चाचा-भतीजा की लड़ाई में एक नाम को काफी पब्लिसिटी मिली है। वह सूरजभान सिंह हैं, जो अबतक रामविलास के काफी विश्वस्त व करीबी माने जाते रहे हैं। बाकियों के बारे में भी कहा जा रहा है कि उन्हें नजरंदाजगी सहना पड़ रहा था, चिराग उनसे बात तक नहीं करते थे। एक और व्यक्ति का नाम उजागर हुआ कि सौरव पांडेय जो कि चिराग के सहयोगी की भूमिका में हैं, काफी मनमानी करते रहे हैं। वह सांसदों को चिराग तक पहुंचने नहीं देते थे। यहाँ चिराग की नाकामी और गैर व्यवहारिकता सामने आई कि कैसे वह अपने सहयोगी की बात मानकर अन्य वरिष्ठ नेताओं को नजरंदाज करते रहे।
पारस सोच रहे हैं कि उनके पास संसदीय संख्या बल है तो वहीं चिराग कागजी और लोकतांत्रिक मजबूती के जरिये भविष्य बचाने की जुगत कर रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि पारस को मिलता है बंगला या फिर चिराग बचा पाएंगे अपना घर। या फिर वर्तमान लड़ाई में चुनाव आयोग दोनों को किरायेदार न बना दे।

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