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कृतज्ञता का एक सुनहरा अवसर

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कृतज्ञता का एक सुनहरा अवसर

सार्थक सोनवलकर

किसी भी समाज अथवा व्यक्ति की मुख्य पहचान उसके द्वारा निर्धारित मूल्यों तथा उनके परिपालन से होती है। यह वर्तमान परिदेश्य में भी उतना ही उपयुक्त होता है, मुख्य रूप से जब समूचा विश्व एक महामारी की चपेट में हो। विश्व में अनेक प्रकार की समस्याएँ हैं और यह अलग अलग व्यक्तियों को भिन्न रूप से प्रभावित करती हैं। समाज के कुछ वर्ग कुछ बड़ी बीमारियों और अन्य समस्याओं से दूसरे लोगो की तुलना में सक्षम रुप से उनका सामना करने में सफ़ल होते हैं।वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग होता है जिसके लिए छोटी से छोटी समस्या भी किसी महामारी से कम नही होती।यह वर्ग अपनी बिषम परिस्थिति, जैसे गरीबी, भुखमरी, जात पात व अन्य कईं कारणों से स्वयं को किसी भी परेशानी से आसानी से निजात पाने में असक्षम पाता है।
पिछले कुछ दिनों में कुछ मार्मिक दृश्यों ने देश ही नही, बल्कि संपूर्ण मानवता के सामने कुछ अहम प्रश्न खड़े कर दिये हैं। क्या एक देश का अस्तित्व कुछ ही लोगों के लिये होता है? क्या इसमे कुछ वर्ग बाकी वर्गों से निचले स्तर पर होते हैं? और यदि एक वर्ग स्वयं को किसी परेशानी से बाहर निकालने में असमर्थ पाता है, तो इसमें ज़िम्मेदारी किसकी बनती है?

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वर्तमान में व्याप्त कोरोना वायरस बीमारी पर उप्लब्ध जानकारी का परिदेश्य मीडिया, प्रिंट मीडिया तथा टी वी मीडिया के होने से बदल जाता है। ऑनलाइन माध्यमों द्वारा जानकारियां तीव्र गति से विश्व के किसी भी कोने में पहुंचायी जा सकती हैं। हम सभी ने प्रवासी मजदूरों के अपने परिवार सहित, भूखे प्यासे, सैकड़ों किलोमीटर चल कर अपने घरों के ओर जाने की तस्वीरों और वीडियो को देखा। जहाँ एक ओर समाज के कईं लोग उनकी मदद करने आगे आये, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगो द्वारा इसे अराजकता का उदाहरण देकर इन ही लोगो को महामारी का भविष्य में फ़ैलने का संभव कारण कहा गया। इसके साथ ही, कुछ देशों के राजनेताओं द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को सम्हालने का कारण देकर परिस्थिति की उपेक्षा करने का प्रयास भी किया जा रहा है। कुछ इस प्रकार के उदाहरण हमरे मूल्यों पर एक विशिष्ट प्रश्न खड़ा करते हैं। क्या यह मूल्य सिर्फ किताबी दुनिया तक सीमित हैं? क्या इन्हें केवल तब उपयोग में लाया जा सकता है जब गलती किसी दूसरे से हो? (जैसा कि उत्तर कोरिया द्वारा मिसाइल परीक्षण करने पर अमेरिका द्वारा किया जाता है) शायद यही समय है हमें हमारे मूल्यों को परखने का तथा उनके दृढ़ता की जांच करने का। इन मूल्यों में अहम हैं समावेशता, सहानुभूति, दया, करुणा तथा सहिष्णुता। यह तथा अन्य कुछ मूल्य आज के संदर्भ में विश्व के लाचार निराश्रित जन के अस्तित्व व हमारे द्वारा किये जाने वाले दावों से सीधे संबंधित हैं।

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जैसा हाल ही में नोआह हरीरि द्वारा हाल ही में लिखे गए एक लेख में कहा गया है कि किस प्रकार देश एक दूसरे की मदद कर कोरोना से लड़ने में सफल हो सकते हैं, वर्तमान तथा आने वाले समय में यह अहम होगा कि किस प्रकार से विश्व को सीमाओं के आगे मानवता की दृष्टि से देखा जाता है। यह विशेष रूप से अहम इसलिए भी है क्योंकि बदलते परिवेश की समस्याएँ व्यक्ति विशेष, सीमाओं, अथवा किसी धर्म विशेष को संज्ञान में न लेकर सभी को समान रूप से प्रभावित कर रही हैं, और ऐसी परिस्थितियों में संकीर्णता से ऊपर उठकर एक वैश्विक दृष्टिकोण का होना ज़रूरी हो गया है। मूल्यों की वास्तव अहमियत तब ही है जब वे विश्व के उन वर्गों के उत्थान में कारगर सिद्ध हो सके जिनकी उपेक्षा विश्व द्वारा अपने हित एवं स्वार्थ के लिये दिन-प्रतिदिन की जाती है। रबीन्द्रनाथ टैगोर की पंक्तियाँ, जिनमें वे एक ऐसे आदर्श विश्व की कामना करते हैं जहाँ ना सीमाएं हैं और जहाँ मनुष्य बिना किसी भय के अपना सिर उठाकर चल सकता है, आज के संदर्भ में कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। इसकी शुरुआत करने के लिये वर्तमान में आये कोरोना के संकट से बेहतर परीक्षा शायद हमारे मूल्यों की नही हो सकती। हम कैसा विश्व बनाते हैं यह पूर्णतः हम पर निर्भर करता है और मानवता के प्रति कृतज्ञता हमारे लिए एक मापदंड है।

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